चिंता को समझना: यह क्या है और क्या नहीं है
- A. K. Sharma
- Jul 18, 2025
- 3 min read
चिंता और डर बनाम सामान्य तनाव
चिंता (Anxiety) और डर (Fear) इंसान की आम भावनाएं हैं। दोनों के लक्षण मिलते-जुलते होते हैं, क्योंकि ये एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। लेकिन इन दोनों में एक छोटा मगर ज़रूरी फर्क होता है।
डर उस वक्त महसूस होता है जब हमें लगे कि कोई खतरा अभी सामने है। जबकि चिंता तब होती है जब हम किसी बात को लेकर पहले से ही परेशान हो जाते हैं, जो शायद आगे चलकर हो सकती है या नहीं भी हो।
ये दोनों हमारे शरीर की प्राकृतिक प्रतिक्रियाएं हैं, जिनका मकसद हमें खतरे से बचाना है। लेकिन जब ये डर या चिंता बार-बार होने लगे, बहुत ज़्यादा हो जाए या हमारी पढ़ाई, काम, रिश्तों या रोज़ की ज़िंदगी में दिक्कत करने लगे, तो यह एक मानसिक समस्या (disorder) बन सकती है।
मानसिक बीमारियाँ कोई अलग चीज़ नहीं होतीं — ये उन्हीं भावनाओं का ज़्यादा और लगातार होना है, जिससे हमारा जीना मुश्किल हो जाता है।
चिंता और डर से जुड़ी मानसिक समस्याओं के प्रकार
चिंता और डर से जुड़ी कई तरह की मानसिक समस्याएं होती हैं, जैसे:
जनरलाइज़्ड एंग्ज़ायटी डिसऑर्डर (GAD) – जब रोज़मर्रा की बातों को लेकर बार-बार और हर वक्त चिंता होती है।
पैनिक डिसऑर्डर – जब बिना किसी चेतावनी के अचानक बहुत ज़्यादा डर लगने लगे और पैनिक अटैक आने लगे।
अगोराफ़ोबिया – जब भीड़, खुली जगह या ट्रैवल जैसी जगहों से डर लगे, जहाँ से निकलना मुश्किल लगे।
फोबिया – किसी खास चीज़ या स्थिति (जैसे ऊँचाई, जानवर, उड़ान) से बहुत तेज़ और असामान्य डर।
सामाजिक चिंता (Social Anxiety Disorder) – जब किसी सामाजिक मौके पर शर्मिंदा होने या जज किए जाने का डर सताने लगे।
सेपरेशन एंग्ज़ायटी – जब अपनों से अलग होने का या घर से दूर जाने का डर बहुत ज़्यादा हो जाए।
सेलेक्टिव म्यूटिज़्म – जब कोई बच्चा कुछ खास जगहों पर बात नहीं कर पाता, जबकि बाकी जगहों पर आराम से बोलता है।
इन समस्याओं को "डिसऑर्डर" इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये हमारी ज़िंदगी को असर डालने लगती हैं, जैसे:
डर या चिंता ज़रूरत से ज़्यादा होती है,
उसे रोक पाना मुश्किल होता है,
हमारी रोज़ की ज़िंदगी में परेशानी आती है।
चिंता के लक्षण क्या होते हैं?
चिंता के लक्षण आम तौर पर तीन हिस्सों में देखे जा सकते हैं:

1. शारीरिक लक्षण (Body Symptoms):
दिल की धड़कन तेज होना
सांस फूलना या घबराहट
पसीना आना
हाथ कांपना
चक्कर आना
पेट में दर्द या गड़बड़
2. भावनात्मक लक्षण (Emotional Symptoms):
लगातार बेचैनी रहना
अंदर से थका-थका या चिड़चिड़ा महसूस करना
घबराहट या डर लगे रहना
कभी-कभी खुद से या दुनिया से अलग-थलग सा लगना
3. सोच से जुड़े लक्षण (Thinking/Cognitive Symptoms):
बार-बार फालतू चिंता करना
किसी काम पर ध्यान नहीं लगना
सबसे बुरा सोचते रहना
ऐसा लगना जैसे चीज़ें कंट्रोल से बाहर हो रही हैं
बार-बार दूसरों से भरोसा या आश्वासन माँगना
चिंता वाली जगहों या लोगों से बचना शुरू कर देना
ये सभी लक्षण आपस में जुड़कर और भी ज़्यादा तकलीफ दे सकते हैं। इसलिए डॉक्टर तभी डायग्नोस करते हैं जब कई लक्षण साथ में हों और रोज़ की ज़िंदगी पर असर डाल रहे हों।
हर चिंता की बीमारी अलग कैसे होती है?
हालांकि सभी समस्याओं में डर और चिंता होती है, लेकिन इनकी वजहें और लक्षण थोड़े अलग होते हैं:
जनरलाइज़्ड एंग्ज़ायटी डिसऑर्डर में लोग हर छोटी-बड़ी बात की ज़रूरत से ज़्यादा चिंता करते हैं, बिना किसी साफ कारण के।
पैनिक डिसऑर्डर में अचानक बहुत ज़्यादा डर लगता है — जिसे पैनिक अटैक कहते हैं। इसमें दिल तेज़ धड़कता है, पसीना आता है, और लगता है कि कुछ बुरा हो जाएगा।
अगोराफ़ोबिया में लोग भीड़ या खुले इलाके जैसे मेट्रो, मार्केट आदि से बचने लगते हैं, क्योंकि उन्हें डर होता है कि वहाँ से भाग नहीं पाएंगे।
फोबिया में कोई एक चीज़ या परिस्थिति से बहुत असामान्य डर होता है — जैसे ऊँचाई, बंद कमरे, जानवर आदि।
सोशल एंग्ज़ायटी डिसऑर्डर में लोगों को लगता है कि सब उन्हें देख रहे हैं, जज करेंगे, या मज़ाक बनाएंगे — जिससे वे सामाजिक कार्यक्रमों से बचते हैं।
सेपरेशन एंग्ज़ायटी ज़्यादातर बच्चों में देखी जाती है, जब उन्हें माँ-बाप से दूर होने में बहुत डर लगता है। लेकिन कई बार यह बड़ों में भी होता है।
सेलेक्टिव म्यूटिज़्म में बच्चे कुछ खास जगहों पर जैसे स्कूल या नए लोगों के सामने नहीं बोल पाते, जबकि घर पर सामान्य बात करते हैं।
निष्कर्ष
हर तरह की चिंता को पहचानना, यह जानना कि यह शरीर, दिमाग और सोच को कैसे प्रभावित करती है — यही पहला कदम है ठीक होने की दिशा में।
अगर सही जानकारी और इलाज मिले, तो कोई भी इंसान अपनी चिंता को संभालना सीख सकता है और एक खुशहाल ज़िंदगी जी सकता है।
याद रखें: अगर आप या आपके किसी अपने को ऊपर दिए लक्षण लंबे समय से परेशान कर रहे हैं, तो एक मानसिक स्वास्थ्य पेशेवर से मिलना बहुत ज़रूरी है। मानसिक स्वास्थ्य का ख्याल रखना भी उतना ही ज़रूरी है जितना शरीर का।


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